न कोई ज़ख़्म लगा है न कोई दाग़ पड़ा है ।
ये घर बहार की रातों में बे-चराग़ पड़ा है ।
अजब नहीं यही कैफ़-आफ़रीं हो शाम-ए-अबद तक ।
जो ताक़-ए-सीना में इक ख़ून का अयाग़ पड़ा है ।
कभी रुलाएगी उस यार-ए-बेवफ़ा की तमन्ना ।
जो ज़िंदगी है तो सद लम्हा-ए-फ़राग़ पड़ा है ।
ये एक शाख़चा-ए-ग़म से इतने फूल झड़े हैं ।
कभी क़रीब से गुज़रो तो एक बाग़ पड़ा है ।
तिरे लबों पे अगर सुर्ख़ी-ए-वफ़ा ही नहीं ।
तो ये बनाओ ये सज धज तुझे रवा ही नहीं ।
मैं तेरी रूह की पत्ती की तरह काँप गया ।
हवा-ए-सुब्ह-ए-सुबुक-गाम को पता ही नहीं ।
किसी उमीद के फूलों भरे शबिस्ताँ से ।
जो आँख मल के उठा हूँ तो वो हुआ ही नहीं ।
फ़राज़-ए-शाम से गिरता रहा फ़साना-ए-शब ।
गदा-ए-गौहर-ए-गुफ़्तार ने सुना ही नहीं ।
चमक रहा है मिरी ज़िंदगी का हर लम्हा ।
मैं क्या करूँ कि मिरी आँख में ज़िया ही नहीं ।
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