Saturday, 13 June 2020

न कोई ज़ख़्म लगा है न कोई दाग़ पड़ा है, ये घर बहार की रातों में बे-चराग़ पड़ा है













न कोई ज़ख़्म लगा है न कोई दाग़ पड़ा है ।


ये घर बहार की रातों में बे-चराग़ पड़ा है ।


अजब नहीं यही कैफ़-आफ़रीं हो शाम-ए-अबद तक ।


जो ताक़-ए-सीना में इक ख़ून का अयाग़ पड़ा है ।


कभी रुलाएगी उस यार-ए-बेवफ़ा की तमन्ना ।


जो ज़िंदगी है तो सद लम्हा-ए-फ़राग़ पड़ा है ।














ये एक शाख़चा-ए-ग़म से इतने फूल झड़े हैं ।


कभी क़रीब से गुज़रो तो एक बाग़ पड़ा है ।


तिरे लबों पे अगर सुर्ख़ी-ए-वफ़ा ही नहीं ।


तो ये बनाओ ये सज धज तुझे रवा ही नहीं ।


मैं तेरी रूह की पत्ती की तरह काँप गया ।














हवा-ए-सुब्ह-ए-सुबुक-गाम को पता ही नहीं ।


किसी उमीद के फूलों भरे शबिस्ताँ से ।


जो आँख मल के उठा हूँ तो वो हुआ ही नहीं ।


फ़राज़-ए-शाम से गिरता रहा फ़साना-ए-शब ।


गदा-ए-गौहर-ए-गुफ़्तार ने सुना ही नहीं ।














चमक रहा है मिरी ज़िंदगी का हर लम्हा ।


मैं क्या करूँ कि मिरी आँख में ज़िया ही नहीं ।


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