Saturday, 13 June 2020

जिस्म के रेगज़ार में शाम-ओ-सहर सदा करूँ, मंज़िल-ए-जाँ तो दूर है तय यही फ़ासला करूँ













जिस्म के रेगज़ार में शाम-ओ-सहर सदा करूँ ।


मंज़िल-ए-जाँ तो दूर है तय यही फ़ासला करूँ ।


ये जो रवाँ हैं चार-सू इतने धुएँ के आदमी ।














किस लिए चोब-ए-सब्ज़ को आग से आश्ना करूँ ।


क़ैद करे तो आप है क़ैद सहे तो आप है ।


मैं किसे रोकता फिरूँ और किसे रिहा करूँ ।














रात रुकी है आन कर ज़र्द सफ़ेद घास पर ।


लाख सुख़न है दरमियाँ किस से किसे जुदा करूँ ।


शाख़ हिली तो डर गया धूप खिली तो मर गया ।














काश कभी तो जीते जी सुब्ह का सामना करूँ ।


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