Saturday, 13 June 2020

गिरने की तरह का न सँभलने की तरह का, सारा वो सफ़र ख़्वाब में चलने की तरह का













गिरने की तरह का न सँभलने की तरह का ।


सारा वो सफ़र ख़्वाब में चलने की तरह का ।


बारिश की बहुत तेज़ हवा में कहीं मुझ को ।


दरपेश था इक मरहला जलने की तरह का ।














इक चाँद उभरने की तरह का मिरे बाहर ।


सूरज मिरे अंदर कोई ढलने की तरह का ।


ऐसा है कि रहता है सदा साथ भी उस के ।


मंज़र कोई पोशाक बदलने की तरह का ।


उड़ती हुई सी रेत वही दश्त में हर-सू ।














पानी वही दरिया में उछलने की तरह का ।


कैसी ये ख़िज़ाँ छाई है मुझ में कि सरासर ।


मौसम है वही फूलने फलने की तरह का ।


क्या दिल का भरोसा है कि इस आब ओ हवा में ।


वैसे ही ये पौदा नहीं पलने की तरह का ।














मालूम भी था मुझ को मगर भूल चुका हूँ ।


रस्ता कोई जंगल से निकलने की तरह का ।


मैं तो यही समझा ‘ज़फ़र’ इस बार भी शायद ।


मुझ पर ये बुरा वक़्त है टलने की तरह का ।


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