फिर कोई शक्ल नज़र आने लगी पानी पर ।
सख़्त मुश्किल में हूँ इस तरहा की आसानी पर ।
उस को परवा ही नहीं है कि वो किस हाल में है ।
मैं ही महजूब हुआ ख़्वाब की उर्यानी पर ।
करता रहता हूँ मैं उस बुत की परस्तिश हमा-वक़्त ।
फिर भी शक है उसे इस जज़्बा-ए-ईमानी पर ।
इक सदा है कहीं रातों में सफ़र करती हुई ।
इक हवा है कहीं आई हुई जौलानी पर ।
कोई रुकता हुआ दरिया मिरे क़दमों में कहीं ।
कोई झुकता हुआ सूरज मिरी पेशानी पर ।
वही मानूस थपेड़े थे मिरे चारों तरफ़ ।
मुझे हैरत न हुई धूप की ताबानी पर ।
वापसी पर जो लगे हैं मुझे अपने जैसे ।
ख़ुश हुआ हूँ दर-ओ-दीवार की वीरानी पर ।
एक दिन सुब्ह जो उट्ठें तो ये दुनिया ही न हो ।
है मदार अब किसी ऐसी ही ख़ुश-इम्कानी पर ।
शेर होते हैं ‘ज़फ़र’ लुत्फ़-ए-सुख़न से ख़ाली ।
दाद मिलती है मुझे अब तो ख़ुश-अल्हानी पर







