इतना ठहरा हुआ माहौल बदलना पड़ जाए ।
बाहर अपने ही किनारों से उछलना पड़ जाए ।
इतना मानूस भी होने की ज़रूरत क्या थी ।
कभी इस ख़्वाब से मुमकिन है निकलना पड़ जाए ।
छोड़ जाएँ जो तुम्हारे सभी होते सोते ।
और कभी साथ हमारे तुम्हें चलना पड़ जाए ।
दूर से देख के हम जिस को डरा करते हैं ।
क्या मज़ा हो जो इसी आग में जलना पड़ जाए ।
क्या ख़बर जिस का यहाँ इतना उड़ाते हैं मज़ाक़ ।
ख़ुद हमें भी कभी इस रंग में ढलना पड़ जाए ।
दिल की ये आब-ओ-हवा इतनी मुख़ालिफ़ है अगर ।
और इन्ही मौसमों में फूलना-फलना पड़ जाए ।
कौन कह सकता है बदले हुए आसार के साथ ।
देखा-देखी ही तबीअ’त को सँभलना पड़ जाए ।
ए’तिबार एक दफ़ा और भी करते हुए फिर ।
इन्हें वा’दों के खिलौनों से बहलना पड़ जाए ।
शो’ला मजबूर हो दरिया पे मचलने को ‘ज़फ़र’ ।
किसी दिन दश्त से चश्मे को उबलना पड़ जाए ।
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