हम ने आवाज़ न दी बर्ग ओ नवा होते हुए ।
और मिलने न गए उस का पता होते हुए ।
आँख के एक इशारे से किया गुल उस ने ।
जल रहा था जो दिया इतनी हवा होते हुए ।
एक पत्ता सा लरज़ता हूँ सर-ए-शाख़-ए-गुमाँ ।
अपने हर-सू कोई तूफ़ान-ए-बला होते हुए ।
चल रहे होते हैं धारे कई दरिया में सो हम ।
सब में शामिल भी रहे सब से जुदा होते हुए ।
वक़्त पर आ के बरस तो गए बादल लेकिन ।
देर ही लग गई जंगल को हरा होते हुए ।
हम भला दाद-ए-सुख़न क्यूँ नहीं चाहेंगे कि वो ।
आप तारीफ़ का तालिब है ख़ुदा होते हुए ।
कुछ हमें भी ख़बर इस की न हुई ख़ास कि हम ।
क्या से क्या होते गए अस्ल में क्या होते हुए ।।
बात का और भी हो सकता है मतलब और फिर ।
लफ़्ज़ तब्दील भी होता है अदा होते हुए ।
क्या ज़माना है कि इस गुम्बद-ए-बे-दर में ‘ज़फ़र’ ।
अपनी आवाज़ को देखा है फ़ना होते हुए ।
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