कैसी रुकी हुई थी रवानी मिरी तरफ़ ।
ठहरा हुआ था अपना ही पानी मिरी तरफ़ ।
तहरीर में भी जो वो मिसाल अपनी आप है ।
पैग़ाम भेजता है ज़बानी मिरी तरफ़ ।
पत्तों का रंग था कि हुआ और भी हरा ।
चलती रही हवा-ए-ख़िज़ानी मिरी तरफ़ ।
है कोई आसमान में जिस की तरफ़ से रोज़ ।
आती है एक याद-दहानी मिरी तरफ़ ।
लफ़्ज़ों का बोझ रहता है सर पर शबाना रोज़ ।
रहती है गुफ़्तुगू की गिरानी मिरी तरफ़ ।
किरदार उस को ढूँडते फिरते हैं जा-ब-जा ।
गुम आ के हो गई है कहानी मिरी तरफ़ ।
थे उस की दस्तरस में अजाइब तो बेश-तर ।
भेजी न उस ने कोई निशानी मिरी तरफ़ ।
रहता है लफ़्ज़ लफ़्ज़ कोई शोर मुझ से दूर ।
करती है ज़ोर मौज-ए-मआनी मिरी तरफ़ ।
जब कोई भी नहीं है तो फिर रात भर ‘ज़फ़र’ ।
होता है कौन आके बयानी मिरी तरफ़







