तिलिस्म-ए-होश-रुबा में पतंग उड़ती है ।
किसी अक़ब की हवा में पतंग उड़ती है ।
चढ़े हैं काटने वालों पे लूटने वाले ।
इसी हुजूम-ए-बला मैं पतंग उड़ती है ।
पतंग उड़ाने से क्या मनअ कर सके ज़ाहिद ।
कि उस की अपनी अबा में पतंग उड़ती है ।
ये आप कटती है या काटती है दूसरी को ।
बस एक बीम-ओ-रजा में पतंग उड़ती है ।
कहीं छतों पे बपा है बसंत का त्यौहार ।
कहीं पे तंगी-ए-जा में पतंग उड़ती है ।
कहीं फ़लक पे सरकती है सरसराती हुई ।
कहीं दिलों की फ़ज़ा में पतंग उड़ती है ।
खुला है इस पे कुछ ऐसे बहार का मौसम ।
है रुख़ पे रंग क़बा में पतंग उड़ती है ।
ये ख़्वाब है कि उलझता है और ख़्वाबों से ।
ये चाँद है कि ख़ला में पतंग उड़ती है ।
उमीद-ए-वस्ल में सो जाएँ हम कभी जो ‘ज़फ़र’ ।
तो अपनी ख़्वाब-सरा में पतंग उड़ती है ।
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