वही मिरे ख़स-ओ-ख़ाशाक से निकलता है ।
जो रंग सा तिरी पोशाक से निकलता है ।
करेगा क्यूँ न मिरे बाद हसरतों का शुमार ।
तिरा भी हिस्सा इन इम्लाक से निकलता है।
हवा के साथ जो इक बोसा भेजता हूँ कभी ।
तो शोला उस बदन-ए-पाक से निकलता है ।
मिले अगर न कहीं भी वो बे-लिबास बदन ।
तो मेरे दीदा-ए-नमनाक से निकलता है ।
उतारता है मुझे नींद के नियसतां में ।
अभी वो ख़्वाब रग-ए-ताक से निकलता है ।
फ़सील-ए-फ़हम के अंदर भी कुछ नहीं मौजूद ।
न कोई ख़ेमा-ए-इदराक से निकलता है ।
धुएँ की तरहा से इक फूल मेरे होने का ।
कभी ज़मीं कभी अफ़्लाक से निकलता है ।
मिरे सिवा भी कोई है जो मेरे होते हुए ।
बदल बदल के मिरी ख़ाक से निकलता है ।
ये मोजज़े से कोई कम नहीं ‘ज़फ़र’ अपना ।
जो काम उस बुत-ए-चालाक से निकलता है ।
उम्मीद करते हैं आपको हमारी पोस्ट पसंद आई होगी।तो दोस्तों हमें कमेंट करके जरूर बताएं और आगे भी ऐसी पोस्ट मिलती रहें इसके लिए आप हमें फॉलो जरूर कर ले।







