Saturday, 13 June 2020

रुका हुआ था वो क़ाफ़िला तो मगर अभी तक, ग़ुबार अपनी ही बे-करानी में जा रहा था













किसी नई तरहा की रवानी में जा रहा था ।


चराग़ था कोई और पानी में जा रहा था ।


रुका हुआ था वो क़ाफ़िला तो मगर अभी तक ।


ग़ुबार अपनी ही बे-करानी में जा रहा था ।


मुझे ख़बर थी वो क्या करेगा सुलूक मुझ से ।














सो मैं ब-ज़ाहिर तो ख़ुश-गुमानी में जा रहा था ।


मैं तंगी-ए-दिल से ख़ुश नहीं था इसी सबब से ।


मकाँ से बाहर की ला-मकानी में जा रहा था ।


तुम अपनी मस्ती में आन टकराए मुझ से यक-दम ।


इधर से मैं भी तो बे-ध्यानी में जा रहा था ।














तिरी रुकावट से भी मिरे पाँव कैसे रुकते ।


कि मैं किसी और सर-गिरानी में जा रहा था ।


मिरे लिए अजनबी था सैलाब-ए-ख़्वाब में वो ।


जो लफ़्ज़ चुप-चाप मौज-ए-मअ’नी में जा रहा था ।














सुख़न से बीमार क्यूँ न होता मैं आख़िर अपने ।


कि लुत्फ़ सारा तो ख़ुश-बयानी में जा रहा था ।


‘ज़फ़र’ मिरे ख़्वाब वक़्त-ए-आख़िर भी ताज़ा-दम थे ।


ये लग रहा था कि मैं जवानी में जा रहा था ।


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