Saturday, 13 June 2020

लब पे तकरीम-ए-तमन्ना-ए-सुबुक-पाई है, पस-ए-दीवार वही सिलसिला-पैमाई है













लब पे तकरीम-ए-तमन्ना-ए-सुबुक-पाई है ।


पस-ए-दीवार वही सिलसिला-पैमाई है ।


तख़्ता-ए-लाला की हर शम-ए-फ़रोज़ाँ जाने ।


किस भुलावे में मुझे देख के लहराई है ।














ख़ाक-दर-ख़ाक छुपी है मिरी आँखों की चमक ।


जिस ख़राबे में तिरी अंजुमन-आराई है ।














अपने ही पाँव की आवाज़ से डर जाता हूँ ।


मैं हूँ और रह-गुज़र-ए-बेश-ए-तन्हाई है ।














फिर सर-ए-सुब्ह किसी दर्द के दर वा करने ।


धान के खेत से इक मौज-ए-हवा आई है ।


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