दिल ना-उमीद तो नहीं नाकाम ही तो है,
लम्बी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है।
बदल जाओ वक्त के साथ या वक्त बदलना सीखो,
मजबूरियों को मत कोसो हर हाल में चलना सीखो।
चले चलिए कि चलना ही दलील-ए-कामरानी है,
जो थक कर बैठ जाते हैं वो मंज़िल पा नहीं सकते।
भँवर से लड़ो तुंद लहरों से उलझो,
कहाँ तक चलोगे किनारे किनारे।
वो छोटी-छोटी उड़ानों पे गुरूर नहीं करता
जो परिंदा अपने लिए आसमान ढूंढता है।
देखकर दर्द किसी का जो आह निकल जाती है,
बस इतनी से बात आदमी को इंसान बनाती है।
जरुरी नहीं की हर समय लबों पर खुदा का नाम आये,
वो लम्हा भी इबादत का होता है,
जब इंसान किसी के काम आये।
रोज रोज गिरकर भी मुकम्मल खड़ा हूँ,
ऐ मुश्किलों! देखो मैं तुमसे कितना बड़ा हूँ।
अपनी उलझन में ही अपनी, मुश्किलों के हल मिले ,
जैसे टेढ़ी मेढ़ी शाखों पर भी रसीले फल मिले ,
उसके खारेपन में भी कोई तो कशिश जरुर होगी,
वर्ना क्यूँ जाकर सागर से यूँ गंगाजल मिले।
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