सफ़र कठिन ही सही जान से गुज़रना क्या
जो चल पड़े हैं तो अब राह में ठहरना क्या ।
जो दिल में गूँजती हो आँख से झलकती हो ।
किसी के सामने उस बात से मुकरना क्या ।
इन्ही रवाँ दवाँ लहरों पे ज़िंदगी कट जाए ।
हो तेरा साथ मयस्सर तो पार उतरना क्या ।
मिले न गौहर-ए-मक़्सूद डूब कर भी अगर ।
तो लाश बन के फिर उस बहर से उभरना क्या ।
जिस आब-रूद की औक़ात चंद क़तरे हो ।
तो उस को फाँदना क्या उस में पाँव धरना क्या ।
जहाँ ग़ुरूर हुनर-परवरी हो पुम्बा-ए-गोश ।
वहाँ तकल्लुफ़-ए-अर्ज़-ए-नियाज़ करना क्या ।
फ़साद-ए-ख़ल्क़ भी हंगामा दीदनी था ‘ज़फ़र’ ।
फिर एक बार वही शोशा छोड़ डरना क्या ।







