Saturday, 13 June 2020

जो टूटती बिखरती सी रहती है रात दिन, कुछ इस तरह की एक सदा है ख़लाओं में













मौसम का हाथ है न हवा है ख़लाओं में ।


फिर उस ने किया तिलिस्म रखा है ख़लाओं में ।


जो टूटती बिखरती सी रहती है रात दिन ।


कुछ इस तरह की एक सदा है ख़लाओं में ।


जारी है रौशनी का सफ़र दूर दूर तक ।














क्या खेल कोई खेल रहा है ख़लाओं में ।


मंज़र भी मुख़्तलिफ़ हैं जुदा इस के रंग भी ।


जिस तरहा कोई ख़्वाब-ए-नवा है ख़लाओं में ।


जारी है कहकशाओं की बारात इस तरह ।


मेला सा जैसे कोई लगा है ख़लाओं में ।














सनअत-गरी की रम्ज़ अलग है ज़मीन पर ।


कारीगरी का राज़ जुदा है ख़लाओं में ।


रफ़्तार और वक़्त का अंदाज़ा है कुछ और ।


फ़ितरत की मुख़्तलिफ़ ही अदा है ख़लाओं में ।














इस काएनात की कोई हद ही नहीं ‘ज़फ़र’ ।


अपना ही उस ने तर्ज़ रखा है ख़लाओं में ।


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